बिहार को ‘विशेष दर्जा’ से क्या होगा फायदा।

Patna : एक बार फिर से बिहार को ‘विशेष राज्य’ का दर्जा दिलाने को लेकर JDU मुखर हो गई है। यह बात तब शुरू हुई, जब बिहार के ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने गुस्से में कहा था कि अब केंद्र सरकार से विशेष राज्य का दर्जा की मांग नहीं करेंगे। तब से JDU के अंदर ये बात फिर से सुलगने लगी।

कुछ दिनों बाद नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार को पिछड़ा राज्य घोषित कर दिया गया। उसके बाद चारों तरफ से नीतीश कुमार के विकास की छवि पर हमले होने लगे। विपक्ष रोज इसे मुद्दा बनाने लगा। फिर JDU ने अपने विशेष राज्य के दर्जे वाले गड़े मुर्दे को जिंदा किया। तभी BJP कोटे की उप मुख्यमंत्री रेणु देवी ने बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की जरूरत नहीं बताई, फिर क्या था CM नीतीश कुमार भड़क गए और बताया कि बिहार को विशेष राज्य की क्यों जरूरत है।

इसके बाद JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह सहित दूसरे नेता भी केंद्र की सरकार के सामने बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की जरूरत बताने लगे। इसको लेकर JDU चरणबद्ध तरीके से विशेष राज्य पर विशेष चर्चा करने लगी है, लेकिन अर्थशास्त्री इसे महज पॉलिटिकल स्टंट बता रहे हैं।

विशेष दर्जा पर बिहार में होती है राजनीति

बिहार के जाने-माने अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी बताते हैं, ‘विशेष राज्य का दर्जा बहुत जरूरी है। जैसे ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलेगा अनुदान की राशि बढ़ जाएगी। बिहार जैसे राज्य को कर में छूट मिलेगी। जैसे ही कर में छूट मिलेगी, इन्वेस्टर अट्रैक्ट होंगे, जिससे इन्वेस्टमेंट आएगा।’

चौधरी कहते हैं, ‘इन्वेस्टमेंट सिर्फ कर छूट से ही नहीं आएगा। विकास केवल धन से नहीं होता है। बिहार विशेष राज्य के दर्जा के लिए डिजर्व करता है, इसमें दो राय नहीं है। रीजनल बैलेंस डेवलपमेंट होना बहुत जरूरी है। ऐसी स्थिति में हम इसके पुरजोर समर्थक रहे हैं, लेकिन विशेष राज्य के दर्जा पर बिहार में राजनीति होती है।’

उन्होंने कहा, ‘नीतीश कुमार इसे पॉलिटिकल टूल्स के रूप में यूज करते हैं। वह यदि चाहते तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाकर विशेष राज्य का दर्जा ले सकते हैं, लेकिन वह दबाव नहीं बनाएंगे, क्योंकि वह सत्ता में बने रहना चाहते हैं। इसके बावजूद बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा की मांग जायज मांग है।’

विशेष राज्यों को मिलता है 90 फीसदी तक अनुदान

दरअसल, विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त राज्यों को केंद्र सरकार से 90 फीसदी अनुदान मिलता है। इसका मतलब केंद्र सरकार से जो फंडिंग की जाती है, उसमें 90 फीसदी अनुदान के तौर पर मिलती है। बाकी 10 फीसदी रकम बिना किसी ब्याज के मिलती है। जिन राज्यों को विशेष दर्जा प्राप्त नहीं है, उन्हें केवल 30 फीसदी राशि अनुदान के रूप में मिलती है। 70 फीसदी रकम उन पर केंद्र का कर्ज होता है।

इसके अलावा विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को एक्साइज, कस्टम, कॉर्पोरेट, इनकम टैक्स में भी रियायत मिलती है। केंद्र सरकार हर साल प्लान बजट बनाती है। प्लान बजट में से 30 फीसदी रकम विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलता है, अगर विशेष राज्य जारी बजट को खर्च नहीं कर पाती है तो पैसा अगले वित्त वर्ष के लिए जारी कर दिया जाता है। जो सामान्य राज्यों को नहीं मिल पाता है।

किन राज्यों को मिला है यह विशेष दर्जा

विशेष राज्य का दर्जा वहां की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और संसाधन के लिहाज से उसकी क्या स्थिति है, इस लिहाज से मिलता है। 1969 में असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को पांचवें वित्त आयोग के कहने पर केंद्र सरकार ने विशेष राज्य का दर्जा दिया था।

नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल ने पहाड़, दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या, आदिवासी इलाका, अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर प्रति व्यक्ति आय और कम राजस्व के आधार पर इन राज्यों की पहचान की थी। इसके बाद अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल और उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था।

14वें वित्त आयोग की सिफारिश की वजह से अब नॉर्थ ईस्ट और पहाड़ी राज्यों को छोड़कर किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिल सकता। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और गोवा की सरकारें भी विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करने लगी हैं।

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