Rajgir Mahotsav : राजगीर महोत्सव, जो कभी बिहार की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम था, अब अफसरशाही के पारिवारिक मनोरंजन का मंच बनता नजर आ रहा है। इस वर्ष के आयोजन में मीडिया के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उसने न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर किया है, बल्कि आयोजन की मूल भावना पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
एक दौर था जब राजगीर महोत्सव में पत्रकारों की मौजूदगी और भूमिका दोनों को अहम माना जाता था। समाचार संकलन, कलाकारों से संवाद और महोत्सव की सकारात्मक छवि गढ़ने में मीडिया की केंद्रीय भूमिका होती थी। लेकिन इस बार स्थिति यह रही कि पत्रकारों को न तो सम्मानजनक स्थान मिला और न ही स्वतंत्र रूप से कवरेज करने की सुविधा।
प्रशासन द्वारा पत्रकारों के लिए वीआईपी गैलरी के समीप स्थान निर्धारित करने का दावा किया गया था, लेकिन वास्तविकता में मुख्य मंच के आसपास की अधिकांश सीटों पर अधिकारियों के परिवारजन, रिश्तेदार और परिचित जमे रहे। कवरेज के लिए पहुंचे पत्रकारों को दूसरे दर्जे की, दूरस्थ और असुविधाजनक जगहों पर बैठने के लिए मजबूर किया गया। पत्रकारों का कहना है कि जिस स्थान पर उन्हें बैठाया गया, वहां से मंच पर प्रस्तुति दे रहे कलाकारों की स्पष्ट तस्वीरें और वीडियो बनाना लगभग असंभव था। जब मीडिया कर्मियों ने बेहतर कवरेज के उद्देश्य से वीआईपी दीर्घा की ओर रुख किया, तो प्रशासनिक कर्मियों ने उन्हें वहां से हटाते हुए दूसरी जगह से काम करने की हिदायत दे दी। इसी दौरान वीआईपी गैलरी में अधिकारियों के परिजन और अतिथि पूरे आराम के साथ कार्यक्रम का आनंद लेते देखे गए।
व्यवस्थाओं में भेदभाव भी खुलकर सामने आया। पत्रकारों के लिए जहां केवल डब्बाबंद नाश्ते की खानापूर्ति की गई, वहीं अधिकारियों के परिवारों और रिश्तेदारों को गरमागरम और विशेष नाश्ता परोसा गया। इस असमान व्यवहार ने मीडिया कर्मियों में तीखी नाराजगी पैदा कर दी।
अव्यवस्था की हद तब पार हो गई जब भीड़ और खराब प्रबंधन के कारण कुर्सियां टूटने लगीं। इसके बावजूद मौके पर तैनात सुरक्षाकर्मी हालात संभालने के बजाय मूकदर्शक बने रहे, जिससे आयोजन की सुरक्षा और प्रबंधन दोनों पर सवाल उठे। राजगीर महोत्सव जैसे प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले आयोजन में मीडिया को नजरअंदाज करना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह दर्शाता है कि आयोजन का उद्देश्य संस्कृति का संरक्षण कम और अफसरशाही का दिखावा ज्यादा रह गया है। पत्रकारों ने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में मीडिया को उसका संवैधानिक सम्मान, उपयुक्त स्थान और समान सुविधाएं दी जाएं, ताकि सच सामने आ सके और राजगीर महोत्सव की साख बची रह सके।

